कालिंजर का किला

विन्ध्याचल की सुरम्य पर्वत श्रृंखलाओं में स्थित कालिंजर दुर्ग चंदेल साम्राज्य का शक्ति केन्द्र था। इसके पश्चिम में यमुना की सहायक बाधिन नदी प्रवाहित है। कालिंजर शब्द कालंजर का अपभ्रंश है। कालंजर शिव का एक नाम है इस शब्द का अर्थ है मृत्यु को नष्ट करने वाला। पद्मपुराण में वर्णित है कि यह स्थान शिव का सान्निध्य प्रदान करने वाला होने के कारण उनके नाम के अनुरूप।
कालंजर नाम से प्रसिद्ध और मोक्षदायी है। समुद्र तल से लगभग 374.00 मी0 की ऊंचाई पर स्थित कालिंजर दुर्ग प्रारम्भ में वृदि जनपद के अन्तर्गत रहा। परवर्ती काल में यहाँ कई राजवंशों यथा पाण्डु राष्ट्रकूट गुर्जर प्रतिहार कलचुरि, आदि का शासन रहा। अन्य साक्ष्यों के अनुसार कालिंजर दुर्ग की नींव 978 ई0 में चन्देलवंशीय नरेश चन्दवर्मन नन्तुक ने रखी थी। अनेकों आक्रमणों का सामना करते हुए दीर्घावधि तक यह दुर्ग चन्देलों का मुकुटमणि बना रहा। 1545 ई0 में शेरशाह सूरी ने कालिंजर दुर्ग पर आकमण कर इस पर अपना आधिपत्य स्थापित्य किया, किन्तु इस अभियान में उसकी मृत्यु हो गयी, अकबर जहाँगीर तथा शाहजहाँ के काल में यह मुगल साम्राज्य का अंग रहा। औरंगजेब के काल में कालिंजर दुर्ग पर गाजा छत्रसाल के नेतृत्व में बुन्देलों ने 18 दिन की घेराबन्दी के बाद घमासान युद्ध के फल प्राप्त की। महाराजा छत्रसाल ने मान्धाता चौबे को दुर्ग का दुर्गपति नियुक्त किया। लम्बे समय तक इनके आधिपत्य में रहने के बाद अन्ततः यह अंग्रेजों के अधिकार में चला गया। इस दुर्ग की आंतरिक सुरक्षा प्राचीर लगभग 5 मी0 चौड़ी है। दुर्ग में प्रवेश हेतु मुख्य मार्ग कालिंजर ग्राम की ओर से है, तथा दूसरा मार्ग पन्ना द्वार था, जो वर्तमान में बन्द है। मुख्य मार्ग पर सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने हेतु सात बार आलमगीर द्वारगणेश द्वार, चौबुर्जी द्वारबुधभद्र द्वारहनुमान द्वारलाल दरवाजा तथा बड़ा दरवाजा है। दुर्ग के पश्चिमी कोने में स्थित नीलकंठ मंदिर में विशाल एक मुखी शिवलिंग से युक्त वृत्ताकार
गर्भगृह है, कालान्तर में जिसके समक्ष चन्देल काल में मण्डप का निर्माण किया गया। मंदिर के आसपास की शिलाओं पर एकमुखी शिवलिंग गणेश, नन्दीतथा शिव भक्तों का रूपायन है। कालिंजर दुर्ग का सबसे विशाल सरोवर कोटितीर्थ है। इसके अतिरिक्त दुर्ग में बुढाबुढी ताल, पाण्डुकुन्ड, रामकटोरा तथा शनिकुण्ड नामक सरोवर दुर्ग की जलापूर्ति के अतिरिक्त धार्मिक
‘ महत्व भी रखते हैं। दुर्ग के दक्षिणी भाग में मृगों का सुन्दर अंकन शिलाखण्ड पर किया गया है।
इसके समीप स्थित जलस्रोत इसके नाम मुगधारा को सार्थक करता है। कोटितीर्थ सरोवर के दक्षिणी
किनारे पर स्थित अमान सिंह महल का निर्माण महाराजा छत्रसाल के वंशज अमान सिंह ने करवाया था। दो मंजिला यह प्रासाद बुन्देला स्थापत्य शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। चूने पर सुन्दर पच्चीकारी द्वारा इसे अलंकृत किया गया था। कालिंजर की कलाकृतियों का विश परिमाण में संग्रह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा इसी महल में किया गया है। यहाँ स्थित अन्य महलों में रानीमहल, जीरामहल, रंगमहल, मोतीमहल एवं चौबेमहल अपने भव्यस्थापत्य के लिये प्रसिद्ध हैं।





